क्या न करें ग्रहण काल के दौरान?

मारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु फैल जाते हैं! खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं! इसलिए ऋषियों ने पात्रों में कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके!

  • सूर्यग्रहण में ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण में तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये! वृद्ध, छोटे बच्चे और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं!
  • पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जाएं! ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिए बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाएं और धुल कर बह जाएं!
  • पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रासता है! चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमज़ोर पड़ती है!
  • ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ना चाहिए!
  • बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिये! ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना और मैथुन करना, ये सब कार्य वर्जित है!
  • भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये!
  • गर्भवती स्त्री को सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण नहीं देखना चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है! इसके लिए गर्भवती स्त्री के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें!
  • ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को कैंची या चाकू चलाने को मना किया जाता है और किसी वस्त्रादि को सिलना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से शिशु के अंगों पर असर पड़ता है!
  • ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान का पूजन, जप इत्यादि करना चाहिए! भजन-कीर्तन करके ग्रहण के समय का सदुपयोग करें! ग्रहण के समय में जो मंत्र आप पहले से करते आ रहे हैं सिर्फ उन मंत्रों का जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है!
  • ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश कर्तन, रति-क्रीड़ा, दन्त मंजन करना वर्जित माने गए हैं!
  • पुराना पानी एवं अन्न नष्ट कर नया भोजन पकाया जाता है और पानी ताजा भरकर पिया जाता है!
  • ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्‌मण को या मंदिर में दान देने का विधान है!
  • ग्रहण के बाद गरीब असहाय को दान देने का अधिक माहात्म्य बताया गया है, क्योंकि गरीब असहाय को राहु-केतु का स्वरूप माना गया है!

सूर्य ग्रहण कब क्यों और कैसे होता है?

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