सूर्य शक्ति का महत्व – सूर्य ग्रहण अध्यात्म और विज्ञान

संसार में प्रत्येक पदार्थ किसी विशेष परमाणु से ही निर्मित होता है! सूर्य की प्रत्येक रश्मि विशेष अणु का प्रतिनिधित्व करती है और संसार के समस्त पदार्थों की संरचना सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही संभव है! यदि सही प्रकार से सूर्य और उसकी रश्मियों के प्रभावों को समझ लिया जाए तो मनुष्य यह समझ लेगा कि जो विज्ञान वह आज जानने में लगा है और फिर कई आश्चर्यजनक परिणाम सामने आएँगे जिन्हें सनातन काल में ही हमारे ऋषि मुनियों ने सूर्य की उन रश्मियों के भेद से जान लिया था और अपने जीवन को विकसित कर लिया था!

एक छोटे से उदहारण के तौर पर शास्त्रों की दृष्टि से समझा जाये तो जो जानकार हैं वे इसलिए सूर्य को सुबह-सुबह अर्घ्य प्रदान करते हैं और सूर्य की रश्मियों को अपने शारीर में समाहित करते हैं जिससे वह तेज उनको भी मिल सके!

भारतीय वैदिक काल और सूर्य ग्रहण

वैदिक काल से पूर्व भी खगोलीय संरचना पर आधारित कलैन्डर बनाने की आवश्कता अनुभव की गई! वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक पूर्वजों के इस महान ज्ञान को प्रतिविम्बित करता है! यह स्पष्ट है कि सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण तथा उनकी पुनरावृत्ति की पूर्व सूचना ईसा से पूर्व ही उपलब्ध थी! चिर प्राचीन सनातन काल में ही महर्षियों ने यह गणना कर दी थी!

ग्रहों व नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है! महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे! ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के परिवार के पास यह ज्ञान उपलब्ध था! इस पर धार्मिक, वैदिक, वैचारिक, वैज्ञानिक विवेचन लगभग सभी धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है!

सूर्य ग्रहण क्या होता है? कब होता है? क्यों होता है?

यह जानकारी लगभग हर एक व्यक्ति हो होती ही है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चंद्रमा पृथ्वी की! कभी-कभी जब चंद्रमा अपनी परिक्रमा के दौरान सूर्य और धरती के बीच आ जाता है, तो ऐसा लगता है कि मानो चंद्रमा ने सूर्य को ढंक दिया हो! पृथ्वी से देखने पर जब चंद्रमा और सूर्य एक ही धुरी (Axis) पर नजर आते हैं, तब सूर्य पूर्ण अथवा आंशिक रूप से चन्द्रमा द्वारा आच्छादित होते हैं!

अर्थात चंद्रमा सूर्य की रौशनी को थोड़ी या पूरी तरह से धरती पर आने से रोक देता है, तब उस खगोलीय घटनाक्रम में चन्द्रमा के पीछे सूर्य का बिम्ब कुछ समय के लिए ढंक जाता है, इसी घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है! यह खगोलीय घटना हमेशा अमावस्या तिथि को ही होती है और सूर्य ग्रहण होने के लिए चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना आवश्यक है! सम्पूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिक से अधिक 11 मिनट ही हो सकती है उससे अधिक नहीं!

कितने प्रकार से सूर्य ग्रहण होता है?

1. पूर्ण सूर्य ग्रहण (Full Solar Eclipse)

full-solar-eclipse-min जब चन्द्रमा पृथ्वी के बेहद समीप रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आता है और चन्द्रमा पूरी तरह से पृथ्वी को अपने छाया क्षेत्र में ले लेता है, जिससे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाता, और पृथ्वी पर अंधकार जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है और पृथ्वी के कुछ हिस्सों में सूर्य दिखाई नहीं देता! इस प्रकार बनने वाला ग्रहण पूर्ण सूर्य ग्रहण कहलाता है!

जैसा कि 11-अगस्त-1999 के सूर्य ग्रहण के समय में देखा गया था!

2. आंशिक सूर्य ग्रहण (Partial Solar Eclipse)

partial-solar-eclipse-minजब चन्द्रमा सूर्य व पृथ्वी के बीच में इस प्रकार आए कि पृथ्वी से देखने पर सूर्य का आधा या कुछ ही भाग दिखाई न दे अर्थात चन्दमा सूर्य के केवल कुछ भाग को ही अपनी छाया में ले पाता है या अन्य शब्दों में सूर्य का कुछ भाग ही ग्रहण के ग्रास में तथा सूर्य का कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है तो पृथ्वी के उस भाग में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहलाता है!

जैसा कि 23-अक्टूबर-2014 के सूर्य ग्रहण के समय देखा गया था!

3. वलयाकार सूर्य ग्रहण (Annular Solar Eclipse)

annular-solar-eclipse-minजब चन्द्रमा पृथ्वी से बहुत दूर रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है अर्थात चन्द्रमा सूर्य को इस प्रकार से ढंक देता है कि सूर्य का केवल मध्य भाग ही चंद्रमा के छाया क्षेत्र में आता है और पृथ्वी से देखने पर चन्द्रमा द्वारा सूर्य पूरी तरह ढका दिखाई नहीं देता बल्कि सूर्य का बाहरी क्षेत्र प्रकाशमान दिखाई देता है जिसके कारण कंगन या वलय की गोल चमकती हुई आकृति दिखाई देती है, इस खगोलीय घटना को वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा जाता है! जैसा कि 20-मई-2012 के सूर्य ग्रहण के समय में देखा गया था और 21-जून-2020 को भी पृथ्वी के कुछ हिस्सों से दिखेगा दिखेगा!

खगोल शास्त्र की दृष्टि में सूर्य ग्रहण

गोल शास्त्रियों ने गणित से निश्चित किया है कि 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं! एक वर्ष में लगभग 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण हो सकते हैं, किन्तु एक वर्ष में 2 सूर्यग्रहण होने ही चाहिए! यदि किसी वर्ष 2 ही ग्रहण हुए तो वो दोनो सूर्यग्रहण ही होंगे! लेकिन सालभर 4 से अधिक ग्रहण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं! प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुन: होता है! किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो यह निश्चित नहीं हैं, क्योंकि सम्पात बिन्दु (Ending Points) निरन्तर चल रहे हैं!

चन्द्र ग्रहण पृथ्वी के आधे से ज्यादा भाग में दिखाई देते हैं जबकि सूर्य ग्रहण पृथ्वी के कम हिस्से में ही दिखाई पड़ता है इस कारण पृथ्वी से सूर्यग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि चन्द्र ग्रहण से कहीं अधिक सूर्यग्रहण होते हैं! 3 चन्द्रग्रहण पर 4 सूर्यग्रहण का अनुपात आता है! सूर्यग्रहण अधिकतम 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौडे क्षेत्र में ही देखा जा सकता है! उदाहरण के तौर पर यदि मध्यप्रदेश में खग्रास सूर्य ग्रहण (Full Solar Eclipse) हो तो गुजरात में खण्ड सूर्य ग्रहण (Partial Solar Eclipse) ही दिखलाई देगा और उत्तर भारत में वो दिखायी ही नहीं देगा!

जानिये 21-जून-2020 को पड़ने वाले सूर्य ग्रहण का आपकी ज़िन्दगी में क्या असर होगा?

जानिये क्या क्या कार्य नहीं करने चाहिये ग्रहण के समय?

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